Wednesday, April 28, 2021

अलग शब्द पर "स्ट्रेस" का जादू

       विगत दिनों बातें अभिनेता की आवाज और उच्चारण  को लेकर हुई।इसी कड़ी में हमने सोचा कि क्यों ना आज संवाद संप्रेषण में स्ट्रेस पॉइंट की ही बात की जाये। स्ट्रेस अर्थात दबाव।कई बार अभिनेता अपनी आवाज़ पर बहुत मेहनत करता है। शब्द के उच्चारण भी सही होते हैं। आरोह अवरोह भी सही होते हैं।परंतु सही शब्द पर दबाव या स्ट्रेस नहीं पड़ने से अभिनेता जो संवाद संप्रेषित कर रहा है उसका अर्थ ही बदल जाता है।
ऐसा कैसे हो सकता है... लेखक ने जो लिखा है, निर्देशक ने जो निर्देश दिया है उसके आधार पर हम संवाद बोल रहे हैं। उसी वाक्य का अर्थ कैसे बदल सकता है ?बदल सकता है जनाब !उदाहरण के लिए आप कोई भी एक वाक्य लीजिए और अलग-अलग शब्दों पर दबाव देकर बोलकर देखिए!
 चलिए उदाहरण के लिए एक वाक्य लेते हैं : -
'मुझे आज उनसे मिलना है!'
 अब इस वाक्य को अलग -अलग शब्दों पर दबाव डालकर देखते हैं उसका अर्थ क्या हो जाता है...
1."मुझे"आज उनसे मिलना है
इसमें मुझे शब्द पर दबाव देने से अर्थ यह निकलता है वो मिले या ना मिले 'मुझे' उनसे मिलना है!
2.मुझे"आज"उनसे मिलना है 
अर्थ- और कभी नहीं,"आज" मिलना है!
3.मुझे आज"उनसे"मिलना है
अर्थ- किसी और से नहीं "उनसे" ही मिलना है!
4.मुझेआज उनसे"मिलना है"
अर्थ- वो ना मिलना चाहें तो भी मुझे "मिलना" ही है!
 देखा आपने... वाक्य वही है परंतु अलग-अलग शब्दों पर स्ट्रेस या दबाव डालने से उसी वाक्य का अर्थ बदल जाता है। इसलिए अपनी स्क्रिप्ट में हर वाक्य में सही शब्द को इनवाइटेड कॉमा या अंडरलाइन करके, उस पर स्ट्रेस देकर बोलिए तो सही अर्थ संप्रेषित होगा!
                         मो० निज़ाम(पथ)जमशेदपुर

Tuesday, April 27, 2021

अभिनेता के शब्द उच्चारण भाग -2

कल के ब्लॉक में हमने शब्दों के उच्चारण से संबंधित  कई बातें की थी  मसलन- किस तरह अलग-अलग भाषा भाषी अभिनेता हिंदी नाटकों के लिए भाषा का जो प्रयोग होता है चरित्र अनुसार ,उसमें फंस जाते हैं या गड़बड़ कर बैठतें हैं।कई बार हमने देखा है कि क और क़ का फ़र्क़ अभिनेता नहीं समझ पाते। इसलिए कि हमें शुरू से हमारे विद्यालयों में उच्चारित करके पढ़ाया नहीं गया, इससे ही हम कंफ्यूज हो जाते हैं।चलिए आज उसी पर थोड़ी सी बातें कर लेते हैं। अंग्रेजी और हिंदी वर्णमाला के अक्षरों को लेकर एक दो उदाहरण लेतें हैं:- जैसे अंग्रेज़ी के K को हिंदी में क का उच्चारण होता है तो Q के लिए 'क़' का। आप और से पड़ेंगे तो को के नीचे एक नुख़्ता(बिंदु) लगा हुआ है जिससे वह कंठ से क़ का उच्चारण होता है। वैसे ही कुछ उदाहरण निम्नांकित हैं:-
J - ज
Z - ज़ 
F -  फ़
PH - फ 
S - स (दंत स)
SH - श (तालव्य श)
आदिI इन उदाहरणों के अलावे और कई अक्षर और शब्द हैं। 
अब ज़रा मिलते जुलते शब्दों के उच्चारण पर ध्यान देते हैं कि कैसे एक ही जैसे शब्द में अक्षर या शब्द के उच्चारण के ग़लत उच्चारित होते ही अर्थ बदल जाता है:-
'सहर' का अर्थ सुबह होता है।
जीभ जब आगे के दांतों से टकरा कर अक्षर को उच्चारित करता है तो दंत: स है। अब अगर जीभ हमारे तालु से टकरा कर उच्चारित करेगा तो तालव्य 'श' होगा। अब वो शब्द होगा -
शहर - इसका अर्थ है नगर ।
दूसरा शब्द नुख्त़े से संबंधित लेतें हैं:-  
आम बोल चाल की भाषा में हम चिपकाने वाले द्रव्य को कहतें हैं - गम।
अब ग के नीचे नुख़्ता लगा कर बोलें, तो उसका उच्चारण और अर्थ दोनों बदल जायेगा
ग़म - दुख।
अब ज़रा छोटी इ बड़ी ई छोटा उ या बड़े ऊ के उच्चारण से बदलने वाले अर्थ  देखिए:- 
सुर - संगीत के सुर के अर्थ में
सूर - अंधेपन के अर्थ में
दुर - भगाने या दुरदुराने अर्थ
दूर -  दूरी या डिस्टेंस
       इस  तरह से हम देखते हैं की अक्षरों या शब्दों के थोड़ी सी चूक होने पर ही अर्थ बदल जाते हैं। सही अर्थ या शब्द चित्र सही सही संप्रेषित हों, इसके लिए अभिनेता /अभिनेत्री को उच्चारण पर विशेष ध्यान देना चाहिए- ताकि वह आगे चलकर विशिष्ट अभिनेता या अभिनेत्री बन सकें!
                   मो० निज़ाम (पथ)जमशेदपुर

Monday, April 26, 2021

अभिनेता के शब्द उच्चारण भाग-1

अभिनेता की आवाज़ के अभ्यास के बाद हमें लगा कि आज अभिनेता के उच्चारण  पर कुछ बात की जाए। क्योंकि अभिनेताओं को उच्चारण में कई तरह की दिक़्कतें आतीं हैं। जो जानकार हैं उन्हें भी जो जानकार नहीं हैं उन्हें भी। उच्चारण के मामले में कहीं ना कहीं गड़बड़ कर जातें हैं, लड़खड़ा जाते हैं और  ग़लत उच्चारण के कारण चरित्र पूरी तरह से स्थापित नहीं हो पाता - और अभिनेता का प्रयास अधूरा रह जाता है। अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़े अभिनेताओं को हिंदी के शब्दों को या उर्दू के शब्दों के उच्चारण में ख़ासी दिक़्कत का सामना करना पड़ता है, तो उर्दू भाषी अभिनेताओं को हिंदी के उच्चारण में ख़ास करके संयुक्त अक्षर वाले उच्चारण में दिक़्कत होती है। प्रकाश को परकाश वगैरह। ठीक इसी तरह हिंदी माध्यम के अभिनेताओं को उर्दू के तलफ़्फुज़ में कठिनाई आती है।जैसे क और क़, ख और ख़, ग और ग़, ज और ज़, स और श वगैरह।
 क्योंकि आज की संस्कृति में हिंदी, इंग्लिश और उर्दू इस तरह से घुल मिल कर मिक्स हो गयें हैं कि अभिनेता को इन सभी भाषाओं के शब्दों और अक्षरों के उच्चारण को समझना महत्वपूर्ण हो जाता है। फिर बारी आती है क्षेत्रीय भाषाओं की, जिन्हें समझना अभिनेता के लिए इसलिए ज़रूरी है कि पता नहीं चरित्र किस क्षेत्र का होI उर्दू में कुछ ऐसे अक्षर या लफ़्ज़ हैं जो हिंदी में मौजूद नहीं है। हिंदी में कुछ ऐसे अक्षर और शब्द हैं जो उर्दू में या और किसी का भाषा में नहीं है। उसी तरह कई क्षेत्रीय भाषाओं में किसी में च' नहीं है तो किसी ज' नहीं है। तो चरित्र अगर क्षेत्रीय हो तो उसकी भाषा में उन अक्षरों या शब्दों का उच्चारण उन क्षेत्रीय लोगों की तरह करना अपेक्षित होगा। चरित्र अगर पढ़ा लिखा है तो शब्दों के उच्चारण शुद्ध करेगा। लेकिन अनपढ़ गवार चरित्र भी अगर शुद्ध उच्चारण करता है तो वह बड़ा अटपटा लगता हैI इसलिए अभिनेता को चरित्र के शैक्षणिक स्तर को भी समझना होगा सही उच्चारण के लिए।
 वैसे तू उच्चारण का विषय लिखने से ज्यादा बोलकर सिखाने का है लेकिन कल उच्चारण भाग 2 में हम अलग अलग शब्दों के उच्चारण करके मिलते जुलते शब्दों से परिचित कराएंगे कि कैसे एक अक्षर के उच्चारण के अलग होते ही अर्थ बदल जाते हैं।मिलतें हैं कल...
     मो०निज़ाम(पथ),जमशेदपुर

Sunday, April 25, 2021

अभिनेता की आवाज़ भाग-2

जैसा कि कल पहले भाग में मैंने कहा था कि आवाज के सही संप्रेषण तथा आरोह अवरोह के लिए हम भाग 2 में अभ्यास के बात करेंगे। यहां कुछ ऐसे अभ्यास की सजेशंस है जिसे आप प्रतिदिन अभ्यास में करतें हैं, तो निश्चित रूप से अभिनेता या अभिनेत्री की आवाज के संप्रेषण और आरोह अवरोह में मदद मिलेगी।
 अभ्यास
अपना हाथ अपने पेट पर रखिए। आपका हाथ वहां आपके मस्तिष्क को फोकस करने भर के लिए नहीं है,बल्कि इसलिए है कि आप अपनी सांस कितनी गहरी लेना चाहते हैं। आपका हाथ वहां आपके पेट की मांसपेशियों की हरकत महसूस करने भर के लिए भी  नहीं है, ना पेट दबाने खींचने के लिए; बल्कि सांस को नाभि तक ला कर आवाज़ को उर्जा से भरने के लिए है।  चलिए अपने पेट को सांस से भर लें और 'जी'... की ध्वनि निकाले। फिर से सांस लें और इस बार बाहर निकालते हुए फ...की निकालें और सांस बाहर निकालने के बारे में जागृत रहें। दोहरायें... इस बार 'वी' की ध्वनि निकालें और अपने होठों पर कंपन मदासूस करें I फिर से सांस लेकर धीरे-धीरे बाहर निकालते हुए  अपने पैरों को एक दूसरे से कुछ अलग अलग करके खड़े हो जाइए। महसूस कीजिए कि आपकी पीठ शरीर से अलग छ्त की ओर खिंचा जा रहा है और आपकी पीठ को बाहर निकालता जा रहा है।
किसी भी तरह के तनाव के लिए दो-तीन बार  बिना पैर जमीन से उठाएं अपने वजन को फर्श पर अनुभव करें। अपने सिर को हिलाए और अपने कंधों को हल्का महसूस करें। फर्श पर बैठ कर धीरे धीरे बोलिए। धीरे-धीरे लिए अपनी सीट का वजन जमीन पर महसूस करें। ज़मीन पर बैठ कर इस प्रकार की ध्वनि निकालें कि आपका मुंह 45 डिग्री पर रहे, तनाव रहित रहे॥अपने मुंह के आगे अपने हाथ रखें और खोलकर सांस बाहर निकालते हुए  ऊ ... की ध्वनि निकालें I ऐसा करते हुए आपको कोई ज़ोर नहीं लगाना है। फिर से सांस भीतर ले ऊँ का उच्चारण करते हुए हर बार आपको ऐसा महसूस होना चाहिए कि सांसो के साथ बाहर निकलती आवाज़ आपके नाभि केंद्र से शुरू हो रहे हों । अब आपको आसानी हो तो इस एक्सरसाइज को घूमते हुए भी कर सकते हैं। यह सभी अभ्यास क्रम में होंगे, ताकि आप अपनी आवाज़ को केंद्रित कर जब आपको अपनी आवाज़ आती महसूस होने लगे तो इस अभ्यास को अपने अनुसार अनुकूल बना लीजिए।
 याद रखें आवाज को मुक्त बनाने के लिए शारीरिक गतियां हमेशा मददगार होती हैं ।
अपने आवास के एक्सरसाइज को  हमेशा कुछ ना कुछ  पढ़कर ही खत्म करना चाहिए। कुछ ऐसा पढ़ना चाहिए जो  ध्वनियात्मक हो,संवादात्मक होI शुरुआत आहिस्ता आहिस्ता पढ़ने से कीजिए और अपनी सांसो पर ध्यान दीजिए। सांसों के अंदर बाहर आने की क्रिया पर ध्यान दीजिए, उनको महसूस कीजिए और मज़बूती दीजिए। फिर अपनी गति बढ़ा दीजिए  और फिर सहज ढंग से पढ़ना शुरू कीजिएI हर वाक्य में सही शब्द पर 'दबाव' डालकर वाक्य को पढ़ना शुरू कीजीए!
जब जिस जब किसी पात्र की तैयारी के लिए आवाज़ का इस्तेमाल करें तो उसकी उम्र, उसकी आर्थिक स्थिति, उसके आत्मविश्वास और चरित्र के अनुसार आवाज़ को संप्रेषित करने का प्रयास करें। हालांकि यह एक लंबी प्रक्रिया है जिसको प्रैक्टिकल किए बिना सिर्फ लेख से समझना मुश्किल हैI
इसके अलावे अनुलोम-विलोम से,कपाल भाती से या हारमोनियम के साथ सरगम के अभ्यास से भी सांस और पिच पर नियंत्रण किया जा सकता है।
लेकिन उपरोक्त तीनों क्रियायें किसी के देख रेख में किया जाये तो ज़्यादा बेहतर होगा।
टी एस इलियट कहते हैं- हमेशा कोशिश करो। लेकिन इतनी कम कोशिश ना करो कि जो चाहते हो वह पूरा ना हो सके... और इतनी ज़्यादा कोशिश भी ना करो कि जितना चाहिए उससे ज़्यादा हो जाए। इसलिए सांस पर नियंत्रण के साथ आप अपनी आवाज़ और संवाद अदायगी के उतार-चढ़ाव पर नियंत्रण पा सकते हैं। एक अच्छे अभिनेता के लिए सांस पर नियंत्रण की बहुत ज़रूरी है, जिससे संवाद अदायगी में उतार-चढ़ाव, सुर ,ताल, लय और संप्रेपणीयता आती है।

Saturday, April 24, 2021

अभिनेता की आवाज़ भाग-1

           हमारे कई रंगकर्मी साथी समय-समय पर अलग-अलग विषय पर ब्लॉग लिखने की मांग करते रहें हैं। सबसे बड़ी समस्या मेरे साथ रहेगी लेखन के विषय को लेकर रही है। नाटक पर तो लिखने और बोलने के लिए ढेर सारे विषय हैं। विषय जब मिल जाए तो फिर जटिलता आती है उसके शुरुआत की' क्योंकि शुरुआत तक बहुत दिक्कत है। कैसे की जाए बात, कैसे की जाए शुरुआत। इस बार मैंने सोचा कि नाटक पर लिखी बहुत सारी ऐतिहासिक,पौराणिक  ग्रंथों या बातों से परे कुछ ऐसा लिखा जाए जो अभिनेताओं के जीवन में उपयोगी सिद्ध हो। क्योंकि मैंने नाटक करते वक्त, नाट्य महोत्सव में देखे गए नाटकों को देखते वक्त, प्रतियोगिताओं में निर्णायक की हैसियत से बैठकर नाटकों को देखते वक्त... बेहतरीन अभिनेताओं को आवाज़ के बेहतर उपयोग के बिना मंच पर लड़खड़ाते हुए देखा है, चरित्र से बाहर जाकर हास्यास्पद बनाते हुए देखा है।बावजूद इसके कि उनका शरीर पात्र के लायक है, वेशभूषा भी ठीक-ठाक है, यहां तक कि चेहरे की और शरीर की भाव भंगिमायें भी बिलकुल अच्छी तरह से आ रहीं हैं। लेकिन आवाज़ के आरोह अवरोह का सही ज्ञान है, ना श्वास पर नियंत्रण। इसकी वजह से कई अभिनेता सचमुच में बेहतर अभिनय करते हुए भी पात्रों को जीवंत करने में लड़खड़ा जाते हैं। आज लिखने से पहले मैंने सोचा क्यों न लेख के माध्यम से किसी अभिनेता के आवाज़ के इस्तेमाल और श्वास पर नियंत्रण की ही बात की जाये। संवाद अगर आपकी सही है,आपकी आवाज़ भारी रही है, आपके उच्चारण दुरूस्त हैं, आपके नियंत्रण में है, आपकी आवाज में दम है तो आप के अभिनय में ना सिर्फ चार चांद लग सकता है, बल्कि आपके व्यक्तित्व को भी बहुत प्रभावशाली बनाया जा सकता है।
           बहुत सारे कलाकार यह नहीं जानते की आवाज़ को दुरुस्त करने के लिए सबसे पहले उन्हें अपनी सांस को नियंत्रित करना होगा। सही ढंग से सांस लेने की प्रक्रिया से हर रोज़ गुज़रना पड़ेगा। जिससे कि वह आगे चलकर अपने नियंत्रित सांसों द्वारा आवाज़ के उतार-चढ़ाव को जब जैसे चाहे इस्तेमाल कर सकेंI
 चलिए सांस को भीतर केंद्र तक लाने का अभ्यास शुरू करते हैं, जिससे बात ही नहीं हो, सांस से संवाद सध जाये।
अभ्यास के तरीक़े कल के ब्लॉग में...😊
                     - मो० निज़ाम (पथ),जमरोदपुर

Friday, April 23, 2021

कला की अभिव्यक्ति

ज़िन्दगी में जब हम(आम लोग) ज़िंदगी की जद्दोज़हद से जूझते हुए या फिर मानसिक थकान अनुभव करते हैं तो कला की ओर उन्मुख होते हैं। वहीं जब कोई कलाकार पीड़ा याअवसाद में होता है तो वह भी कला की ओर उन्मुख होता है । 
पहले का कदम मन के सहज सुख के लिए और दूसरे का चेतना की अभिव्यक्ति के लिए  । 
हां, कला दोनों को आकर्षित करती है । कला के कारण ही दोनों के मध्य संवाद स्थापित हो पाता है । संवाद स्थापित हो जाने के बीच जिस माध्यम का प्रयोग किया जाए वो संचार कहा जाता है।    
           आज कोराेना के विषम काल में मूर्त और अमूर्त कला दोनों ही संचार के डिजिटल माध्यम पर निर्भर है और बहुते हद तक माध्यम ही हावी  है । उक्त  माध्यम में कला रंगत में तो है, लेकिन वह ऊर्जा,भावना और उमंग कहीं गुम हो गई है । हम आज महज़ बाहरीआवरण को हीअनुभव करते हैं, उसकी अभिव्यक्ति को नहीं।निश्चित ही लोग आज डिजिटल युग में कम ख़र्च में लुत्फ ज़्यादा पा रहे हों, पर प्राप्त सुख की मीमांसा नहीं कर रहे। ऊपरी आवरण का सुख ऊपरी तुष्टि भले दे सकता हो मगर अंतरमन की भूख जीवंत व  चेतन अभिव्यक्ति से ही संभव है। 
कलाकार और दर्शक दोनों को संचार से पहले सरोकार पर ध्यान केंद्रित करना होगा,वर्ना दोनों ही उपभोकता मात्र ही रह जाएंगे। कलाकार और रसिक दोनों ही "प्रोडक्शन" के जाल में उलझे हैं बनिस्बत इसके कि  वह क्रियेशन और उसके प्रभाव के विषय में सोचें । 
       साथियों, इस विचार के माध्यम से मैं ब्लॉग की शुरुआत कर रहा हूं आप सब लोग इससे जुड़ें, अपनी प्रतिक्रिया दें, प्रोत्साहन दे, विषय सुझायें ताकि हम इसे निरंतर जारी रख सकें। धन्यवाद!