Thursday, May 9, 2024

 अपने आकाश का रंगमंच




आज मेरे यार की शादी है... ब्रास बैंड की टीम पूरी तन्मयता के साथ फ़िल्म दूसरा आदमी" की उपरोक्त महा- फेमस गाने की धुन बजा रही है और उस धुन पर संभ्रांत घर के स्त्री-पुरुष, युवक- युवतियां लगभग मदहोशी के आलम में नाचते हुए आनंद सागर में गोते लगा रहे हैं। बीच बीच में बमों के धमाके, अनार नाम के अग्नि सितारों की चकमक आतिशबाज़ी और खुशी से आसमान की ओर लपकती रॉकेटों की सीं ... की आवाज़ के बीच रंग-बिरंगी जलती- बुसती लाईटों ने अद्‌भुत और मन दुश्य उत्पन्न कर दिया था।


इस दृश्य को देख एक साथ दो लोगों पर दो तरह की प्रतिक्रियाएं हुई! पहली -गाड़ी चलाते मेरे शिष्य ने गाड़ी लगभग रोक कर खुशी से सराबोर हो रहा था. उसकी आँखे- ये बर्षा कर रही थी।


दूसरी-उस दृश्य के देखकर मेरी आँखें अतीत की 'फ्लापी" में कुछ सर्च करने की कोशिश में अपने ऊपर उदासी तारी कर रहीं थीं।


क्या हुआ सर ?... मैं खामोश!


सर... सर... अं... मेरी तंद्रा टूटी और उसकी ओर देखा, जिसका नाम भविष्य वर्मा था।


क्या सर... कितनी बार कहा कि उम्र को इतना हावी ना होने हैं। अपने ऊपर ... नो शिकायती लहजे में प्यार से कहे जा रहा था। इतनी चहल-पहल, धूम-धड़ाके के बीच खुश होने के बजाये आप उदास हो गये... देखिये रोशनियों के रंगों से नहाये इस हॉल की दीवारों को। क्या रोड बन रहें हैं अलग अलग देशों के... पैटर्न


हां भविष्य... दरअसल इस हॉल की बाहरी दीवारों पर जो रंगों के पैटर्न बन रहें हैं ना.. वैसे ही पैटर्न हम कभी इसी हॉल के भीतरी हिस्से में बनाया करते थे-- वही याद आ गये!


क्या ? इस हॉल के भीतर ? मतलब ? - जिज्ञासु हो उठा भविष्य


हां इसी हॉल के भीतर एक शानदार मंच हुआ करता था... रंगमंच.. पृथ्वीराज कपूर, सौमित्र चटर्जी, शंभु मिश्रा, बंसी कौल, उषा गांगुली सहित अपने शहर एक से एक धुरंधर वरिष्ठ रंगकर्मियों के • रचनात्मक कृतित्व का साक्षी रंगमंच.


....ये थियेटर हॉल था ?? अधिक जिज्ञासा - साथ में आश्चर्य का पुट था ।


हां - शहर का ही नहीं हमारे राज्य को सबसे अच्छा थियेटर हॉल-


एक से एक नाटकों की प्रस्तुतियों को अपने भीतर समाये रख थियेटर के मंच है पर सौभाग्य से मैने भी कुछ नाटकों की प्रस्तुतियां की हैं- लाइटों से पैटर्न बनाये हैं- गालियां.. तालियों.. तारीफ़ - कितना कुछ मिला था यहां से वो सब अतीत वक़्त की चमक में खो गई... अब तो यहां शादियों होती है। बड़ी - बड़ी कंपनियों के सेमिनार होते हैं- इसके मुख्य पृष्ठ पर अब पैसे होते हैं... और हमारे जैसे रंगकर्मी या रंगकर्म रखे बस दूर से निहारते हुए हाशिये पर खड़े रहते हैं।


उपरोक्त दृश्य या संवाद आपको किसी नाटक या फ़िल्म का लग सकता है। लेकिन ये किसी नाटक के संवाद नहीं - हर छोटे बड़े शहर की एक क्रूर हक़ीकत है। ऐसी हकीकत जिसके पंजों से लगभग हर छोटे शहर या मंझोले शहरों के रंगकर्मी ज़ख्मी हुए हैं।


जी हाँ हम बात कर रहे हैं. प्रेक्षागृह की ... रंगमंचीय प्रेक्षागृह के अभाव की। आर्थिक रूप से लगातार तरक्की के इस दौर में लगभग और अधिक क्रिया नाटकों के मंचन का को स्थान पर अब शादियों, कंपनियों या धनाढ्‌यों का कब्ज़ा हो चुका है। जिस उद्देश्य से इन्हें ज़मीने एलॉट की गई थीं. वो उद्देश्य अब "मेंटेनेंस" की भेंट चढ़ गये हैं। अब वहां नाटकों को के संवादों की जगह बाबाओं के प्रवचन गूंजते है दृश्यों की बनावट की जगह मॉडलिंग जगत के सितारों की शारीरिक कसावट दिखती हैं; नाटकों के लाईट की जगह शादी-ब्याह की लाई हे जलती हैं दर्शकों की जगह - बाराती, रसिक और भक्तों ने ले लिया है नाटक को अपनी राह तलाशने के लिए बाहर काका रास्ता दिखा दिया गया है। रंगकर्म अपनी नियति पर आंसू बहाते हुए किसी वैकल्पिक स्थान। मंच की तलाश में यहां से वहां भटक रहा है। कला  अब या तो ग्रांट वाले थियेटरों में भव्यता दर्शन करा रही या किसी फुटपाथ के कोने में अपने गढ़े आकाश के नीचे मंच का आभास कर प्रद‌र्शित हो रही है।


ऐसा नहीं है कि सभी शहरों या प्रेक्षागृहों का यही होता है। अब भी कुछ स्थानों पर ऐसे प्रेक्षागृह बच्चें है, जहां कलात्मक प्रतिबद्धता, शेष है। वो अब भी मात्र नाम मात्र के किराये पर उपलब्ध है। जहां उपलब्ध है, वहां लगातार नाटक हो रहे हैं...जहां नहीं है प्रतिबद्धता वाले प्रेक्षागृह आय के स्रोत में बदल गये हैं, वहां नाटक अपने अस्तित्व को मचाये रखने के लिए संघर्षरत है।


मगर... जिजीविषा के वाले जुझारु रंखकार्ययों की कभी भी तो नहीं है। ऐसे लोग छोटे स्टूडियो थियेटर बना रहे हैं। किसी छु बद‌विनेत्रा को, मैल पार्क में, किसी कोने को वैकल्पिक रंगकर्म का अड्डा बनाते हुए रंगमंच को बचा रहे हैं। और ऐसे लोग जब तक हैं, तब तक भविष्य के प्रति आश्वस्त हुआ जा सकता है कि रंगकर्म ।रंगकर्म जुनून से चलता है! सारे रंगकर्मियों को सलाम !


अपने बलबूते ना सिर्फ ज़िंदा रहेगा, बल्कि कलात्मक प्रस्तुतियों से संवेदनाओं की अमृत को संजीवनी से सशक्त समीक संरचना को बरकरार रखने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता रहेगा ।


मो० निजाम  

रंगकर्मी पथ जमशेदपुर

उपाध्यक्ष ए आई टी सी ।