Thursday, May 12, 2022
कोरोना चकित है...
कंपोजिशन नाटकों पर व्यवस्थित रंगमंच व्यवस्थित
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कंपोजीशन नाटकों को रंगमंच पर एक व्यवस्थित और सलीके से प्रस्तुति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है ।
इस बात को हम चित्रकला के माध्यम से समझने की कोशिश कर सकते हैं। कैनवस पर जब चित्र बनाया जाता है तो उस में कहां क्या होगा इस बात को चित्रकार बहुत सलीके से कंपोज करता है । पहाड़ कहां होगा, पहाड़ का रंग क्या होगा, पहाड़ की उपस्थिति क्या दर्शाए... यह चित्र में कंपोजीशन का हिस्सा है । फिर पहाड़ के किस तरफ पेड़ होंगे, किस तरफ पक्षी उड़ेंगे, किस तरफ नदी या तालाब होगा, किस तरफ से लाइट का स्रोत होगा... मतलब रोशनी किधर से आएगी, कहां परछाई पड़ेगी- यह सारी चीजें नाटक को डिजाइन करते समय ,कंपोज करते समय ध्यान में रखते हैं । मंच पर कहां क्या व्यवस्थित रूप से रखा जाएगा, क्या प्रकाश व्यवस्था होगी, क्या मंच सज्जा होगी, क्या चीज किस करीने से रखी जाए कि वह ना सिर्फ दर्शकों को पसंद आए, बल्कि नाटक के विषय वस्तु को भी स्पष्ट रूप से बताएं और कलात्मक रूप से उनके दिमाग पर असर करें ।
कंपोजीशन करने में भारत की विभिन्न नाट्य शैलियों में अलग-अलग स्वरूप लेती है ।
नाट्यधर्मी और लोकधर्मी मूल रूप से दो शैलियां है । नाट्य धर्मी में लोक और परंपरागत नाटक जिनमें हर चीज में - चाहे वह मंच सज्जा हो, वस्त्र विन्यास हो, रूप सज्जा हो, अभिनय शैली हो सभी चीज़ों नाटकीयता मौजूद होती है, जो अपने नाटकीयता से दर्शकों को कल्पना लोक में ले जाकर उनका ज्ञान वर्धन करते हैं ।
हमारे झारखंड में जात्रा, रामलीला, नौटंकी जैसी नाट्य शैलियां मौजूद हैं, वहीं छऊ की विभिन्न शैलियों को भी नृत्य नाट्य की शैली माना जा सकता हैं । क्योंकि उसमें भी कथा का मंचन होता है अखरा या मुक्ताकाशी मंच पर ।
लोक धर्मी को हम रियलिस्टिक नाटक के रूप में देख सकते हैं, जिसमें मुख्य रुप से प्रोसेनियम थिएटर में होने वाले वास्तविक स्वरूप के नाटक हैं !जिनमें मंच सज्�