ताज्जुब है कि ऐसे वक़्त में भी कई बुद्धिजीवी कहलाने वाले तथा कथित मानव - मानवता की रक्षा कैसे हो सोचना छोड़कर कुछ राज्यों के चुनावी नतीजों का विश्लेषण करते हुए सोशल मीडिया पर अपने अपने पसंदीदा पार्टीयों की "मौत को आमंत्रण" देने वाली रैलियों को बिसरा कर वोटों के प्रतिशतों का आकलन कर ख़ुद को श्रेष्ठ और दूसरों को नीचा दिखाने में लगें हुए हैं।कोरोना ख़ुद चकित है कि ये कैसे लोग हैं जो मेरी ख़ौफ़नाक़ उपस्थिति को नज़र अंदाज़ कर आपस में श्रेष्ठ होने की होड़ में लगें हैंI
मानवता को शर्मसार करते इन विश्लेषकों से निवेदन है कि पहले मानव और मानवता बचा लें, फिर लोक तंत्र और श्रेष्ठ अश्रेष्ठ के विशेषज्ञ बनें तो हमारे देश के हित में होगा !
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