Friday, February 18, 2022

भारतीय रंगमंच की उत्पत्ति संक्षिप्त परिचय


 १. भारतीय रंगमंच की उत्पत्ति के बारे में वैसे तो धार्मिक मान्यता है की चारों वेदों में से अलग अलग तत्वों को लेकर, उन्हें समायोजित करके नाट्य शास्त्र या नाट्य वेद की रचना हुई।इस मान्यता के अनुसार देवताओं और दानवों के बीच अमृत मंथन के समय पहले नाटक की शुरुआत हुई । एक अवधारणा के अनुसार भारतीय रंगमंच का इतिहास गुफावासियों के साथ शुरू हुआ।

 ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में संस्कृत रंगमंच की शुरुआत के साथ एक यथार्थवादी स्वरूप प्रारंभ हुआ। वास्तविक रूप से, संस्कृत रंगमंच को भारतीय रंगमंच के पहले प्रतिनिधित्व के रूप में मान्यता दी गई है। दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के लंबे समय के युग में शुरुआत, संस्कृत रंगमंच तब धार्मिक और पौराणिक कथाओं के प्रदर्शन के लिए प्रसिद्ध था,जिन का मंचन और राजकीय रंगशाला में होता था। शूद्रक, भास या कालिदास जैसे नाटककार उस समय  प्रसिद्ध थे।

संस्कृत नाटकों के बाद 15 वीं या 16 वीं शताब्दी में धार्मिक पौराणिक ऐतिहासिक कथाओं के साथ-साथ नए नए विषयों को लेकर लोकनाट्य परंपराएं सामने आई ।

तीसरे दौर में भारतेंदु हरिश्चंद्र के बाद जयशंकर प्रसाद धर्मवीर भारती विष्णु प्रभाकर जैसे नाटककरो ने भारतीय रंगमंच को एक नया स्वरूप प्रदान किया ।

पारसी थिएटर के बाद उसे नियम रंगमंच आया और उसके साथ आधुनिक स्वरूप की हिंदी नाटकों की शुरुआत हुई जिसमें प्रमुख रुप से मोहन राकेश को आधुनिक नाटकों के प्रवर्तक माना जाता है अलग-अलग भारतीय भाषाओं में गिरीश कर्नाड ,विजय तेंदुलकर, शांता गांधी तथा बादल सरकार जैसे कई नाटककार हुए ; जिन्होंने भारतीय रंगमंच के आधुनिक रूप का निर्माण किया ।

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