३.तोहफा लोक रंगमंच का
भारतीय रंगमंच को लोक और पारम्परिक नाटकों ने और शैलियों ने समृद्ध और सशक्त बनाया है।
संक्षेप में कहें तो भारतीय रंगमंच को लोक और परम्परागत नाट्य शैलियों- रासलीला, रामलीला, तमाशा, खयाल, यक्षगान, माचा ,जत्रा आदि तमाम लोकनाट्य परंपराओं से समय-समय पर इतनी सारी चीजें मिली कि उसने एक संपूर्ण भारतीय रंगमंच को बहुत सशक्त बनाया । उदाहरण के तौर पर किसी परंपरागत नृत्य शैली से भारतीय रंगमंच को मुखोटे मिले । मुखौटों ने नाट्य प्रस्तुतियों का तरीका बदल दिया । साइकोलॉजिकल रूप से मुखौटों का प्रयोग करना भारतीय रंगमंच को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है ।
किसी पारंपरिक नृत्य शैली से हमें आर्य यानी तो वस्त्र आभूषण और रूप सज्जा के नए नए तत्व मिले ।
किसी पारंपरिक नाट्य शैली ने हमें नृत्य नाटक की अवधारणा दी ।
किसी पारंपरिक शैली ने हमें अलग अलग तरीके के संगीत दिए और अलग अलग तरीके की गायन शैलियां दी ,कहीं से मुक्ताकाशी रंगमंच यानी ओपन थिएटर का रूप मिला, तो कहीं तीन तरफ दर्शकों की उपस्थिति की तकनीक मिली और कहीं अखरा में ही नाटक कर देने की परम्परा मिली ।
इस तरह हम कह सकते हैं कि लोक नाट्य परंपरा होनी भारतीय रंगमंच के समय सुख समृद्धि किया है और मजबूत बनाया है ।परंपरागत नाटकों का यह इनफ्लुएंस - अब भी जारी है ।
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